हम विद्यार्थी भूल रहे संस्कृति और संस्कारों को हम विद्यार्थी भूल रहे,जीवन के संस्कारों को। माँ की ममता भूल रहे,पिता का मान भुलाते हैं,बड़ों के चरणों में झुकना,अब हम कहाँ निभाते हैं?आशीषों की छाँव छोड़कर,ढूँढ़ रहे हम सहारों को,हम विद्यार्थी भूल रहे,संस्कृति के उन प्यारों को। दादी की मीठी लोरी अब,कानों में कम आती है,नानी की प्यारी कहानियाँ,यादों में रह जाती हैं।मोबाइल की झिलमिल दुनिया,खींच रही मन-तारों को,हम विद्यार्थी भूल रहे,जीवन के संस्कारों को। गुरु को पहले देव मानकर,शीश झुकाया जाता था,गुरु की हर एक सीख को,जीवन-मंत्र बनाया था।अब तो चकाचौंध लुभाती,भाती झूठी बातों को,हम विद्यार्थी भूल रहे,गुरु के उन