रघु की उड़ान

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गांव के बड़े वाले मैदान में आज बड़ी चहल-पहल थी। चुनाव का मौसम था। एक क्षेत्रीय नेताजी मंच से गरज-गरज कर भाषण दे रहे थे। पूरा मैदान भीड़ से खचाखच भरा था, नारे लग रहे थे।उसी भीड़ से थोड़ा दूर, एक नीम के पेड़ के नीचे एक हट्टा कट्टा सा लड़का खड़ा था - रघु। उम्र यही कोई 22-23 साल। हाफ पैंट पहने, कंधे पर एक मैला सा गमछा। उसकी आँखों में भाषण के लिए कोई उत्साह नहीं था, बस एक चिंता थी - नौकरी की।रघु बेरोजगार था। घर पर कर्ज का पहाड़ था। बापू बीमार रहते थे, छोटे भाई-बहन