कोहरे का पुराना पुल और अंदर की आवाज़"मैं खुद को अकेला, बेबस खड़ा समझ के आगे बढ़ रहा हूँ,मेरे कदमों के पर-कच्चे उड़ रहे हैं।कदमों की आहट में, मैं खुद को सुन रहा हूँ,चारों तरफ अंधेरा है, घनघोर घटा सी छाई है......मुझे लग रहा है, मैं खो रहा हूँ।पर ये क्या?पानी की लहर की आवाज़ आई है,क्या यह मेरा भ्रम हैं?लेकिन नहीं बहाव के साथ कोई आवाज आई हैं....ओह! नीचे नदी है....... सरर-सरर कर रही है।पर ये छन-छन की आवाज़ क्यों है?क्या कोई सामने मेरे चुड़ैल खड़ी है?यह पुराना पुल है, शायद कोई खड़ा हो......कोई बेबस, अ