DASTAN-E-KARB - भ्रम से परे क्या है? - Chapter 3 Scene 3

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ऐवान-ए-सद्र में अकेले अपने ख़्यालों के साथ अम्मा साहब ऐवान-ए-सद्र के झरोखे से इक़ामतगाह की तरफ़ की चहल पहल देख रहीं थी। उनके मन की उलझन उनके चेहरे से ज़ाहिर हो रही थी जिसकी वजह से वो ग़मग़ीन भी थीं।"मैं अंदर आ जाऊं?" शेख़ बाबा की गूंजती आवाज़ ने अम्मा साहब का ध्यान तोड़ दिया"आइए बाबा।" अम्मा साहब ने ख़ुद को समेटा "आज नाजाने क्यों ठीक से नींद ही नहीं आई।" दीवान पर बैठते हुए बाबा ने बताया"कल रात की हवा ने सभी को शायद बहुत बेचैन कर रखा था।"... अम्मा साहब ने सुस्त लहजे में कहा फिर बात बदल दिया