वो तीसरा दरवाज़ा - भाग 2

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शीशे के अंदर की परछाईं ने जैसे ही शेखर का गला दबोचा, कमरे की बत्ती अपने आप जल उठी। सामने खड़े इंसान को देखकर शेखर के पाँव तले ज़मीन खिसक गई—क्योंकि वह चेहरा किसी भूत का नहीं, बल्कि खुद उसका अपना था!शीशे में दिख रही उस खौफ़नाक आकृति का सड़ता हुआ हाथ जैसे ही शेखर के काँधे को छूने लगा, शेखर की चीख पूरे कमरे में गूँज उठी। उसने बदहवासी में पीछे हटने की कोशिश की, लेकिन उसके पैर ज़मीन में जम चुके थे। कमरे का तापमान एकदम से जमने की हद तक गिर गया था।अचानक, कमरे में टंगी मोमबत्तियाँ