आधुनिकता की अंधी दौड़ में जब शहर के कंक्रीट के मकान ऊंचे होते जा रहे थे, तब गाँव के मुहाने पर खड़ा वह पुराना घर दिन-ब-दिन और अकेला पड़ता जा रहा था। ईंटों की दरारों से झांकती घास और ज़ंग लगे लोहे का मुड़ा हुआ मुख्य द्वार जैसे बीते ज़माने की दास्तान बयां कर रहे थे।राघव करीब पंद्रह साल बाद अपने उस पैतृक घर लौटा था। शहर में उसके पास एक शानदार फ्लैट था, गाड़ियों का काफ़िला था और हर तरह की आधुनिक सहूलियत थी। पर दिल के किसी कोने में एक अजीब सी बेचैनी थी, जो उसे खींचकर वापस