स्कूल में नंबर कम आने का डर था, आज जिंदगी में हार जाने का डर है।उसने यह वाक्य डायरी के आखिरी पन्ने पर लिखा और देर तक उसे देखता रहा।सामने मेज पर लैपटॉप खुला था। स्क्रीन पर एक ई-मेल था, जिसे वह पिछले आधे घंटे से पढ़ने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था। असफलता का संदेश नया नहीं था। पिछले कुछ महीनों में ऐसे कई संदेश उसकी स्क्रीन पर आ चुके थे।लेकिन हर असफलता के साथ आदमी थोड़ा-सा टूटता नहीं है।कभी-कभी वह भीतर से इतना खाली हो जाता है कि टूटने की आवाज भी सुनाई नहीं देती।राघव के साथ