अरे बहू! ज़रा चाय तो बनाना, और हाँ, मलाई मत डालना," मालती जी ने अपनी जगह से ही आवाज़ लगाई।तभी दरवाज़ा खुला और उनकी बेटी पूजा मुस्कुराते हुए अंदर आई। मालती जी के चेहरे पर झट से खिलखिलाती धूप तैर गई। "अरे मेरी पूजा! बैठ-बैठ, थक गई होगी। बहू, ज़रा पूजा के लिए बढ़िया इलायची वाली चाय और साथ में थोड़े काजू-बादाम ले आना।"किचन से सीमा की धीमी आवाज़ आई, "जी माँ जी, अभी लाई।"सीमा पिछले दो सालों से इस घर की बहू थी। उसने हर रिश्ते को दिल से संभाला था, लेकिन मालती जी के चश्मे का रंग बेटी