पिता जी - भाग 1

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शाम के ढलते ही जब आँगन में पुरानी साइकिल की वही जानी-पहचानी चैन की आवाज़ गूँजती, तो पूरे घर को बिना घड़ी देखे पता चल जाता कि पिता जी घर लौट आए हैं। रामेश्वर जी एक छोटे से कस्बे के दफ़्तर में क्लर्क की मामूली सी नौकरी करते थे। दिन भर की कड़ी धूप, काम का मानसिक तनाव और चेहरे पर पसीने की बूंदें... लेकिन घर के दरवाज़े पर कदम रखते ही उनके चेहरे पर एक ऐसी सुकून भरी मुस्कान आ जाती, मानो दिन भर की सारी थकान पल भर में गायब हो गई हो। वे अपने हर दर्द को