चैप्टर 3: अंजान आवाजसमीर की आँखें एक अचानक लगे झटके के साथ खुल गईं। उसकी सांसें बहुत तेज चल रही थीं जैसे वह किसी बहुत लंबे और डरावने सफर से दौड़ कर वापस लौटा हो। कमरे के अंदर सुबह के सूरज की हल्की और सुनहरी रोशनी खिड़की में लगी लोहे की बारीक जाली में से छनकर अंदर आ रही थी। रोशनी के उस तिरछे और सुनहरे जाले में धूल के अनगिनत बारीक कण हवा में बहुत शांति से तैरते हुए साफ दिखाई दे रहे थे। उस खिड़की के बिल्कुल पास ही जमीन पर उसका छोटा भाई बहुत गहरी और सुकून भरी नींद में सोया