वाजिद हुसैन सिद्दीक़ी की कहानीउन दिनों सरकारी स्कूल केवल पढ़ाई की जगह नहीं होते थे, वे समाज का आईना भी होते थे। वहां शिक्षा सिर्फ सर्टिफिकेट का ज्ञान नहीं थी, बल्कि आदमी बनने की तमीज़ भी सिखाई जाती थी। उनमें व्यवसायिकता की लाइलाज बीमारी नहीं घुसी हुई थी, जहां किताबें भी होती थी और अध्यापक पढ़ते- पढ़ाते भी थे, सो छठी से शुरू होने वाली अंग्रेज़ी पर भी पकड़ बना लेते थे। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के रिठौरा गांव के जूनियर हाई स्कूल में एक ऐसे ही मास्टर थे- अब्दुल रहमान, -शेरवानी- पायजामा पहनावा, छरहरे बदन के। आंखें चीते जैसी-दूर से ही