संयोगिता ने दरवाजे पर कदम रखा, लेकिन तभी रुक गई। उसने पीछे मुड़कर विराट को देखा। उसकी आँखों में अब कोई आंसू नहीं थे, बस एक गहरा, ठंडा संकल्प था।संयोगिता (धीमी, लेकिन दृढ़ आवाज में) बोली- और मैं उस शिकारी को खत्म कर ही डालूंगी। फिर खुद को भी खत्म कर लूंगी।पूरे कमरे में सन्नाटा छा गया। गंगा जी की चीख निकल गई।गंगा जी बोलीं- नहीं! संयोगिता, ऐसा मत कहो!विराट दौड़कर संयोगिता के पास आया। उसने उसका हाथ पकड़ लिया।विराट (घबराहट से) बोला- संयोगिता, तुम क्या कह रही हो? तुम अपने आप को क्यों खत्म करोगी?संयोगिता ने विराट की आँखों में देखा। उसकी