DASTAN-E-KARB - भ्रम से परे क्या है? - Chapter 2 Scene 2

SCENE 2"पहले पहर का वक़्त था, ताज़ी ठंडी हवाएं पेड़ों को झूमने पर मजबूर कर रही थीं, सूरज आसमान पर धीरे धीरे चढ़ कर आसमान को पीले रंग से सजा चुका था, आसमान के गालों पर हल्की लालिमा भी छा गई। चिड़िया ने पेड़ो पर चहचहाना शुरू कर दिया। अम्हेल दरगाह के आंगन में चादर बिछा कर बैठी हुई क़ुदरत को देखते हुए आसमान की तरफ़ देखकर, आंखों में आंसू भरे दुआएं करती नज़र आई"वो तो मालिक हैना, वो तो वो है जिसने क़ुदरत बानाया है, जिसने असमान और ज़मीन बिछाया, कहते हैं उसे सब मालूम है फिर क्यों उसे मेरे