क्या नसीब है यार

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सुबह के करीब छह बज रहे थे।गाँव की गलियों में अभी पूरी तरह चहल-पहल शुरू नहीं हुई थी। कहीं दूर किसी घर से चूल्हे पर चाय चढ़ने की खुशबू आ रही थी, तो कहीं आँगन में बंधे जानवरों की आवाजें सुनाई दे रही थीं।पहाड़ों के पीछे से सूरज धीरे-धीरे ऊपर आ रहा था।लेकिन आरव की आँखें उससे पहले ही खुल चुकी थीं।वह कुछ देर तक छत को देखता रहा।हर सुबह की तरह आज भी उसके मन में कोई खास योजना नहीं थी।न कोई बड़ा सपना।न कोई बड़ी मंजिल।बस जिंदगी चल रही थी।आरव की उम्र ज्यादा नहीं थी, लेकिन उसके चेहरे