भाग 13 — जब पुरुष टूटने लगता हैरात के लगभग ग्यारह बज चुके थे।पूरा घर सो चुका था।लेकिन मिहिर की आँखों में नींद नहीं थी।वह बालकनी में अकेला बैठा था।सामने सड़क पर कभी-कभार कोई गाड़ी गुजरती और फिर चारों तरफ वही खामोशी छा जाती।मिहिर के हाथ में चाय का कप था, लेकिन चाय कब की ठंडी हो चुकी थी।उसकी नजरें सामने थीं और मन कहीं बहुत दूर।पिछले कुछ दिनों से उसके भीतर बहुत कुछ जमा हो रहा था।ऑफिस का तनाव।घर की जिम्मेदारियाँ।पिता की उम्मीदें।माँ की भावनाएँ।पत्नी निशा की शिकायतें।बच्चों की जरूरतें।और इन सबके बीच…मिहिर खुद कहाँ था?यह सवाल वह खुद