दो बेटियां

सूरज ढलने को था और रसोई से उठते धुएँ के बीच सरला जी चुपचाप खड़ी थीं। उनकी नज़र सामने वाले कमरे में बैठी अपनी बेटी रिया पर पड़ी। रिया अपने पति और बच्चों के साथ हँस-हँसकर बातें कर रही थी। सरला जी ने झटपट उसके लिए उसकी पसंद की गरम-गरम पूरियाँ तलीं और थाली सजाकर मेज पर रख दी।"रिया बेटा, पहले तू खा ले, फिर आराम कर लेना," सरला जी के चेहरे पर एक माँ की ममता झलक रही थी।तभी बगल वाले कमरे से उनकी बहू नेहा बाहर आई। नेहा दिन भर के दफ़्तर के काम के बाद अभी-अभी लौटी