(सूरज की हल्की धूप कमरे में फैल रही है। सिया धीरे-धीरे आँखें खोलती है। उसका चेहरा मासूम और शांत दिखता है। पिछले रात की घटनाओं का कोई पता नहीं।सिया (अचकचाते हुए, खुद से) बोली - “कल रात… क्या हुआ था? मुझे कुछ याद नहीं…कबीर जी कहाँ है?”(वो अपने कमरे में देखती है — सब सामान वैसा ही है जैसे हमेशा रहता है। कोई डर नहीं, कोई लाल आँखें नहीं। सिर्फ उसका पति, इंसानी रूप में, कुर्सी पर बैठा काम कर रहा है।)सिया (धीरे-धीरे मुस्कुराते हुए) बोली - “हाँ… ये वही मेरे पति हैं… हमेशा की तरह…”(कबीर सिया की तरफ देखता है और