सौदा

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गाँव के छोर पर खड़ी वो पुरानी ईंटों की हवेली सिर्फ एक मकान नहीं थी बल्कि तीन पीढ़ियों के खून पसीने और अनगिनत उम्मीदों की एक ऐसी जीवंत दास्तान थी जिसकी हर एक दीवार पर संघर्ष की अनकही कहानियां दर्ज थीं। हवेली के सहन में नीम का वो पुराना पेड़ आज भी वैसे ही शान से खड़ा था जिसके छांव में बैठकर भवानीप्रसाद ने अपने तीनों बेटों को उंगलियों से पकड़कर इस दुनिया में चलना सिखाया था। उस पेड़ के नीचे बैठकर जाड़े की सर्द रातों में तीनों भाई एक ही फटी हुई पुरानी चादर ओढ़कर आपस में लिपट जाते