बनारस की सुबह हो और चौराहे पर चाय-पान की दुकान पर पंचायत न हो, ऐसा तो बनारस के इतिहास में कभी हुआ ही नहीं है। सुबह की ताजी ठंडी हवा के बीच जब घाटों पर घंटियाँ बजती हैं, तो पूरा शहर भक्ति और मस्ती के रंग में डूब जाता है। लेकिन जैसे-जैसे सूरज चढ़ता है, बनारस की सड़कों की असल रंगत और यहाँ के चिरकुट टाइप पात्रों की हरकतें शुरू होती हैं। दोपहर के ठीक दो बज रहे थे। चिलचिलाती धूप में गर्मी अपने चरम पर थी, मानो आसमान से आग बरस रही हो। अस्सी घाट की तरफ जाने वाले