वो हवेली

शहर से कई किलोमीटर दूर, घने जंगलों और ऊँचे-ऊँचे पेड़ों के बीच एक पुरानी हवेली खड़ी थी।लोग उसे “काली हवेली” के नाम से जानते थे।कभी वह हवेली बेहद खूबसूरत हुआ करती थी—ऊँची पत्थर की दीवारें, बड़े-बड़े झरोखे, नक्काशीदार दरवाज़े और हवेली के बीचों-बीच बना एक विशाल आँगन।लेकिन पिछले कई सालों से वहाँ कोई नहीं रहता था।हवेली की दीवारों पर काई जम चुकी थी और जगह-जगह पत्थर टूट चुके थे। खिड़कियों के शीशे गायब थे और हवा चलने पर पुराने दरवाज़े अपने आप चर्रर… चर्रर… की आवाज़ करते हुए हिलते रहते।हवेली के चारों तरफ इतने घने पेड़ थे कि दिन के