बांसुरी की धुन - भाग 4

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रामलाल की पहली वाणी"जयगुरु..."रामलाल के मुँह से निकला यह एक शब्द पूरे प्रांगण में जैसे ठहर गया।उसने सामने बैठे लोगों की ओर देखा। सैकड़ों आँखें उसी पर टिकी थीं।उसके हाथ काँप रहे थे।माइक पकड़ने का यह उसका पहला अवसर था।कुछ क्षण वह मौन खड़ा रहा। फिर उसने गहरी साँस ली और धीरे-धीरे बोलना शुरू किया—"जयगुरु... आप सभी को।"उसकी आवाज में न वक्ता का आत्मविश्वास था, न किसी विद्वान का गर्व।वहाँ केवल एक पश्चाताप से भरे मनुष्य की सच्चाई थी।"मैं कोई ज्ञानी नहीं हूँ... न गुणी हूँ।"भीड़ बिल्कुल शांत थी।"मैंने ऐसी कोई गली, चौक या रास्ता नहीं छोड़ा, जहाँ मैं शराब