बांसुरी की धुन - भाग 2

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जयगुरु श्रीमान् बांसुरी की वह धुनभाग द्वितीय — जागरणरामलाल तेज कदमों से दौड़ता हुआ घने जंगल में जा पहुँचा।वही जंगल...जहाँ कभी वह बचपन में बकरियाँ चराया करता था।वही पहाड़...वही पेड़...और वही बड़ी-सी चट्टान, जिस पर बैठकर उसने पहली बार बाँसुरी में सुर भरना सीखा था।वर्षों बाद उस चट्टान को देखते ही उसके कदम लड़खड़ा गए।वह वहीं गिर पड़ा।हाथ-पाँव शिथिल हो गए। साँसें तेज चलने लगीं। उसके मुँह से झाग निकलने लगा और कुछ ही क्षणों में उसकी आँखें बंद हो गईं।वह बेहोश हो चुका था।उसके भीतर जैसे वर्षों का संचित दर्द एक साथ उठ खड़ा हुआ था। मानो स्मृतियों की