बांसुरी की वह धुनभाग — प्रथमभारत को आज़ाद हुए अभी कुछ ही वर्ष हुए थे।देश स्वतंत्र हो चुका था, लेकिन गाँवों की गरीबी अभी भी वैसी ही थी, जैसे आज़ादी की किरण पहाड़ों के उस पार कहीं रुक गई हो। पेट की आग, कर्ज का बोझ और अभाव से भरा जीवन करोड़ों लोगों की नियति बना हुआ था।जिस धरती पर वीर सिद्धू-कान्हू मुर्मू ने अंग्रेजी सत्ता के विरुद्ध विद्रोह का बिगुल फूँका था, उसी संताल परगना के एक पहाड़ी इलाके में जिलिंग टांडी नाम का एक छोटा-सा गाँव था।चारों ओर पहाड़ थे, घने जंगल थे और लाल मिट्टी की सँकरी