अनंत के उस पार - 6

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कागज़ की उम्रसुबह की धुंधली रोशनी जब तीसरी मंज़िल की सीढ़ियों पर फैली, तब मीरा वहीं बैठी हुई थी।उसके काँपते हाथों में कागज़ का वह छोटा सा, पीला टुकड़ा अब भी दबा हुआ था। रात की वह नीली रोशनी अब गायब हो चुकी थी, दरवाज़े के नीचे की दरार में अब सिर्फ़ सुबह का स्लेटी अँधेरा भरा हुआ था, और तीसरी मंज़िल की लकड़ी से किसी के चलने की कोई आवाज़ नहीं आ रही थी।सब कुछ इतना शांत था मानो रात को जो कुछ हुआ, वह केवल मीरा के थके हुए दिमाग का एक भयावह सपना था।लेकिन मीरा के हाथ