पुरानी ईमारत

पुरानी इमारतलेखक: विजय शर्मा एरीशहर के किनारे, जहाँ नई इमारतें आसमान छूने की होड़ में थीं, एक पुरानी इमारत खड़ी थी। तीन मंज़िला, पीली दीवारें जिन पर समय की परतों ने काला धब्बा जमा दिया था, टूटी खिड़कियाँ, और छत पर उगी घास। लोग उसे “भूतिया महल” कहते थे। कोई पास से गुज़रता तो सर झुका लेता, बच्चे खेलते-खेलते अचानक चुप हो जाते। कहते थे रात को वहाँ रोशनी जलती है, सीढ़ियों पर कदमों की आहट आती है, और कभी-कभी कोई औरत रोती सुनाई देती है।मैं अरुण था। तीस साल का, शहर में नौकरी करता, अकेला रहता। माँ-बाप गाँव में