अध्याय – 2 : सुबह का पहला शव पहली जनवरी की सुबह शहर अभी भी पिछली रात के उत्सव की थकान से उबर रहा था। सड़कों पर बिखरे रंगीन कागज़, बुझी हुई आतिशबाज़ी और खाली बोतलें रात के उन्माद की गवाही दे रही थीं। शहर से लगभग पंद्रह किलोमीटर दूर, साल और सागौन के जंगलों के बीच बना सरकारी विश्राम गृह अपनी सामान्य निस्तब्धता में डूबा था। विश्राम गृह का चौकीदार रामदयाल हर दिन की तरह सुबह छह बजे उठा। उसने आँगन में झाड़ू लगाई, चूल्हे पर चाय चढ़ाई और रजिस्टर देखने बैठ गया। रात की ड्यूटी पर आए