घर का राह लेखक: विजय शर्मा एरीशहर की चकाचौंध में खोया हुआ एक युवक था—अर्जुन। दिल्ली की ऊँची इमारतों, तेज़ ट्रैफिक और कभी न खत्म होने वाली भीड़ के बीच वह पिछले सात साल से जी रहा था। नौकरी अच्छी थी, फ्लैट किराए पर था, दोस्त थे, पार्टियाँ थीं… पर दिल में एक खालीपन था। हर रात जब वह अकेला बिस्तर पर लेटता, तो माँ की आवाज़ याद आ जाती—“बेटा, घर कब आओगे?” और वह जवाब में सिर्फ “जल्द ही” कह देता।उस दिन भी वही हुआ। ऑफ़िस से लौटते हुए मोबाइल पर माँ का मिस कॉल था। अर्जुन ने कॉल बैक