मेरा घर

मेरा  घर  लेखक: विजय शर्मा एर्रीगाँव की धूल भरी पगडंडी पर चलते हुए जब मैंने पहली बार उस छोटे से मकान को देखा था, तब मेरी उम्र सिर्फ आठ साल थी। बाबा के हाथ में मेरा हाथ था, और अम्मा के कंधे पर एक पुराना बिस्तर बंधा हुआ था। हम तीनों खड़े थे उस कच्ची ईंटों के मकान के सामने, जिसके दरवाजे पर जंग लगी हुई कुंडी लटकी थी। बाबा ने धीरे से कहा था, “बेटा, यह हमारा पहला घर है।”उन शब्दों ने मेरे कानों में गूँजते हुए एक अजीब सी गर्माहट पैदा कर दी थी। उस दिन से पहले