वह आखिरी सुबहनीलगढ़ की सुबह कभी रोशनी के साथ नहीं आती थी। यहाँ सवेरा किसी पुराने कैनवास पर बिखरे स्लेटी और सफ़ेद रंगों के धुंधले घोल जैसा होता था, जो धीरे-धीरे पहाड़ियों की ढलानों पर फैलता था। समुद्र तल से बाईस सौ मीटर की ऊँचाई पर बसा यह छोटा सा कस्बा जब ओस और धुंध की चादर से बाहर निकलने की कोशिश करता, तब तक दोपहर के बारह बज चुके होते थे। देवदार और बलूत के ऊँचे, काले पेड़ इस धुंध में किसी खामोश पहरेदार की तरह खड़े रहते थे, मानो वे सदियों पुराना कोई ऐसा रहस्य छुपा रहे हों also you can listen on pocket fm