लेख हिंदी के दो शिखर कवि , दो भिन्न दिशाएँविवेक रंजन श्रीवास्तव आधुनिक हिंदी कविता के विराट परिदृश्य में नागार्जुन और मुक्तिबोध दो ऐसे शिखर हैं, जिन्होंने कविता को सामाजिक सरोकार और वैचारिक गहराई की नई ऊँचाइयों तक पहुँचाया। दोनों अन्याय, शोषण और विषमता के विरुद्ध खड़े होते हैं; दोनों की संवेदना का केंद्र आम मनुष्य है; दोनों प्रगतिशील चेतना से अनुप्राणित हैं। फिर भी उनकी काव्य-दृष्टि और अभिव्यक्ति के मार्ग भिन्न हैं। एक जनता के बीच खड़ा होकर बोलता है, दूसरा मनुष्य के अंतर्मन में उतरकर उसकी चेतना का अन्वेषण करता है।नागार्जुन हिंदी के अप्रतिम जनकवि हैं। उनकी कविता खेत-खलिहानों, मजदूरों