वह जगह जहाँ हम खिलते हैं

(16)
  • 342
  • 1
  • 96

“मुझे किसी एक दायरे में मत बाँधिए। मैं वहाँ खिलती हूँ जहाँ मुझे अपनापन मिलता है, वहाँ शांत हो जाती हूँ जहाँ मुझे आँका जाता है, और वहाँ धीरे-धीरे खो जाती हूँ जहाँ मेरी ऊर्जा खत्म होने लगती है।”कुछ महीने पहले हमारे विद्यालय में एक नई शिक्षिका आईं।वे समय की पाबंद थीं, अपने काम के प्रति ईमानदार थीं और हमेशा चेहरे पर एक हल्की-सी मुस्कान रहती थी।हर सुबह वे स्टाफ रूम में आतीं, सभी को विनम्रता से नमस्ते करतीं, अपना काम करतीं और छुट्टी होते ही चुपचाप घर चली जातीं।वे किसी की बातचीत में बीच में नहीं बोलती थीं।बिना ज़रूरत