बचपन की यादेंलेखक: विजय शर्मा एरीगाँव की संकरी कच्ची गलियाँ, मिट्टी की मीठी खुशबू, तालाब किनारे की ठंडी हवा और आम के पेड़ों से झरती धूप—यही मेरी दुनिया थी। जब आँखें बंद करता हूँ तो आज भी वही दृश्य जीवित हो उठते हैं। बचपन कोई समय नहीं था, एक भावना थी—बेफिक्र, मासूम और अनंत।मैं नया-नया स्कूल में दाखिल हुआ था। कक्षा पाँच। डर और संकोच से भरा। नए चेहरे, नई किताबें, नई वर्दी। माँ ने सुबह जल्दी उठाया, थाली में गरम पराठे रखे और कहा, “बेटा, हिम्मत रखना। स्कूल घर जैसा ही है।” लेकिन दिल धड़क रहा था।स्कूल गेट के