ॐ सत्यं मे गुरुः। सत्यं मे शरणम्। सत्यं मे जीवनम्। गुरु-पूजा नहीं, सत्य-पूजा Agyat Agyani मेरी दृष्टि में सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं है कि गुरु कितना महान है, बल्कि यह है कि उसे भीतर स्मरण करने से मैं कैसा बन रहा हूँ। जिसे हम बार-बार स्मरण करते हैं, उसके गुण धीरे-धीरे हमारे भीतर उतरने लगते हैं। यदि गुरु में क्रोध, अहंकार, लोभ, भय, सत्ता या विभाजन है, तो वही संस्कार शिष्य में भी विकसित हो सकते हैं। इसीलिए मैं कहता हूँ—गुरु की अंध-पूजा मत करो; सत्य की पूजा करो। गुरु का सम्मान करो, पर उसे अंतिम सत्य मत मानो।