लेखक की कलम से…कहानियाँ सहज ही मन से जुड़ जाया करती हैं। पढ़ते-पढ़ते किरदार अपने से लगने लगते हैं। मगर कविताएँ पहली नज़र में अपने रहस्य नहीं खोलती। वो पाठक से ठहराव माँगती है। धीरे-धीरे मन में घुलती हैं। ये कविताएँ अलग-अलग भाव संसार की यात्रा कराती हैं। आशा है कहीं कुछ पंक्तियाँ आपके भी मन में घुल पायें…जैसे तुम ही हो...हे गिरिधर!जब अनंत आकाश को देखती हूँजाने क्यों ऐसा लगता हैजैसे तुम ही हो…रंग भी तुमसे मेल खाता हैऔर भाव-व्यवहार भीजब बदलियों की ओट में रहता हैतो लगता हैतुम ही चोरी-छिपेथोड़ा माखन खा रहे होऔर उससे अधिक गिरा रहे