43.मैं एक कुत्ता हूँ, इंसान नहीं.सुनो ओ दो पैरों वाले,तुम क्यों खुद को श्रेष्ठ बताते हो?अहंकार की भारी गठरी लेकर,दिन-रात व्यर्थ मंडराते हो। हाँ, मैं एक कुत्ता हूँ, इंसान नहीं,तुम्हारी तरह मेरा कोई नकली मान नहीं।तुम्हारे पास भाषा है, पर बस झूठ बोलते हो,भीतर नफरत पालकर, बाहर अमृत घोलते हो। मैंने वफादारी सीखी है, मक्कारी नहीं,मालिक से गद्दारी की, ऐसी कोई बीमारी नहीं।तुम मंदिर-मस्जिद में जाकर भी मौन नहीं होते,और तुम्हारी तृष्णा की आग कभी शांत नहीं होती। तुम महलों में रहकर भी भीतर से कंगाल हो,वासना और ईर्ष्या का बुना हुआ जाल हो।मैं रोटी के एक टुकड़े में भी तृप्त सो जाता