मंजिले - भाग 51

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52----------- ( एक चोट )नसीब आदमी से कया कया नहीं कराता, आदमी कठपुतली है परमात्मा के इशारे पर चलता है, काटे चुने चाहे गुलाब हिस्से कया आता है ये सिर्फ ऊपर वाला जानता है। मैंने किसको कया देना है, वोही जानता है।किसे के हिस्से तख्त ताज और किसे के हाथ कोयलों की खान... बस और कया, ज़िन्दगी इसी का नाम है। ज़िन्दगी पता दे कर नहीं भेजती, पते ढूढ़ने पड़ते है, बहुत खूब... जियो जीने आये हो, किसी को चोट दे कर नहीं, मरने के समान होता, होता है ऐसा जीना... कमबख्त ज़िन्दगी अदला बदली नहीं, इसे मंजर की तरा