राहें - 10

जीवन की डगरबादल गरज रहे थे, अंधेरा घिर आया था सतीश साहब घर के बरामदे में बैठे, बदले मौसम का आनन्द ले रहे थे।तभी एक रिक्शा वाले ने सतीश गुप्ता से गिड़गिड़ाते हुये बोला- साहब मेरी बाई (पत्नी) अस्पताल में भरती है, मुझे कुछ पैसों की जरूरत है, मैं गरीब आदमी हूँ मेरी मदद करो, साहब बच्चा होने वाला है।सतीश साहब ने उसे तीन हजार रूपये देते हुये कहा-इतने से काम चल जायेगा? और उन्होनें तीन हजार रूपये रिक्शे वाले को दे दिये।सतीश गुप्ता का पुत्र अतुल-बड़े घृणित भाव से कभी पिता को देखता और कभी रिक्शे वाले को देखता