रात के लगभग साढ़े नौ बजे थे।सिंह परिवार के घर की ऊपरी मंज़िल पर बना स्टडी रूम हमेशा की तरह शांत था। दीवारों पर सजी किताबें, बीच में रखी विशाल सागौन की मेज़ और खिड़की के बाहर पसरा बनारस का सन्नाटा पूरे कमरे को एक गंभीर वातावरण दे रहा था।शिवाय प्रताप सिंह खिड़की के सामने खड़े बाहर देख रहे थे। उनके चेहरे पर हमेशा की तरह वही ठहराव था, लेकिन आँखों में वर्षों से अधूरी एक तलाश साफ़ झलक रही थी।तभी दरवाज़े पर हल्की-सी दस्तक हुई।"Come in"दरवाज़ा खुला और कुशल अंदर आया।"बड़े भाई सा..."कुशल का शिवाय से कोई ख़ून का