उधर...शाम ढल चुकी थी।वाराणसी शहर अपनी रौनक में डूबा हुआ था। घाटों पर आरती की तैयारियाँ चल रही थीं|उसी समय शहर के बाहरी हिस्से में कई गाड़ियों का एक काफ़िला तेज़ी से आगे बढ़ रहा था।सबसे आगे चल रही काली SUV की पिछली सीट पर शिवाय प्रताप सिंह शांत भाव से बैठे खिड़की के बाहर देखते जा रहे थे।उनके पीछे की गाड़ियों में शिवानी, रुद्र, कामाक्षी और कार्तिक बैठे थे।शिवानी पूरे रास्ते खिड़की से बाहर झाँकते हुए उत्साहित होकर कभी घाटों की तरफ इशारा करती, तो कभी पुरानी इमारतों को देखकर मुस्कुरा उठती।"भाई सा को देखिए…" उसने हँसते हुए कहा,