वो लड़की जो कभी नहीं हारीअध्याय 12 — वह अनजान सहारासुबह की धूप आँगन में फैली हुई थी। तुलसी के पास रखा दीपक बुझ चुका था, लेकिन उसकी हल्की-सी खुशबू अभी भी हवा में थी।रुहिका अपने कमरे में बैठी थी। सामने वही डायरी, वही अधूरी पांडुलिपि और वही सपना...उसने प्रकाशन संस्था को जवाब नहीं दिया था।उसने अपना सपना माँ की दवाइयों के लिए पीछे रख दिया था।दिल में हल्का-सा दर्द था, लेकिन पछतावा नहीं।तभी मोबाइल की घंटी बजी।एक अनजान नंबर था।"नमस्ते, क्या मैं रुहिका जी से बात कर रहा हूँ?""जी... मैं ही बोल रही हूँ।""मैं आर्यन मेहता बोल रहा हूँ।