Devil की दास्तान - 35

सूरज की पहली किरणें खिड़की से भीतर आ रही थीं। हवा में हल्की सी गर्माहट थी।सिमरन धीरे-धीरे अपनी आँखें खोलती है। उसके आसपास का कमरा बिल्कुल अनजान था —सफेद दीवारें, साधारण सा बिस्तर, और एक कोने में बैठा एक अजनबी… करण।)सिमरन (धीरे से) बोली - “मैं... कहाँ हूँ? और आप... आप कौन हैं?”(करण ने एक पल के लिए उसकी ओर देखा।उसकी आँखों में वही पुराना प्यार था, लेकिन चेहरा शांत रखा।)करण (धीरे से मुस्कुराते हुए) बोला - “तुम यहाँ सुरक्षित हो। कल रात तुम रास्ते में बेहोश हो गई थीं… मैंने ही तुम्हें यहाँ लाकर रखा।”सिमरन बोली - “ओह… धन्यवाद… पर मेरा नाम