श्री मलोत्रा अपनी बेटी कल्याणी के साथ हवेली की ओर लौट रहे थे।कार शहर की भीड़भाड़ से निकलकर अब एक सुनसान सड़क पर पहुँच चुकी थी।चारों ओर सन्नाटा पसरा हुआ था।सड़क के दोनों ओर घने पेड़ खड़े थे, जिनकी परछाइयाँ सड़क पर अजीब-सी आकृतियाँ बना रही थीं।दूर-दूर तक कोई दूसरी गाड़ी दिखाई नहीं दे रही थी।हवेली अब ज़्यादा दूर नहीं थी।बस कुछ ही मिनटों की दूरी बाकी थी।कार के भीतर माहौल बिल्कुल अलग था।श्री मलोत्रा पूरे रास्ते अपने आने वाले नाती की बातें कर रहे थे।"देखना, मैं उसे सबसे पहले घुड़सवारी सिखाऊँगा..."उन्होंने हँसते हुए कहा।कल्याणी मुस्कुराई।"पापा... अगर वो घोड़ों से