महाराज भर्तृहरि की वाणीमहाराज भर्तृहरि उज्जैन के महान राजा थे, जिन्होंने वैराग्य होने पर राजपाठ त्याग दिया और परम योगी बने। उनकी रचनाएँ ‘नीतिशतकम्’ और ‘वैराग्यशतकम्’ आज के व्यावहारिक जीवन के लिए सबसे सटीक मार्गदर्शन करती हैं।“भोगा न भुक्ता वयमेव भुक्ताः, तपो न तप्तं वयमेव तप्ताः।कालो न यातो वयमेव याताः, तृष्णा न जीर्णा वयमेव जीर्णाः॥”( हमने भोगों (साधनों) का उपभोग नहीं किया, बल्कि भोगों ने ही हमें खा लिया। हमने तप नहीं किया, बल्कि हम खुद ही चिंताओं की आग में तप गए। समय नहीं बीता, बल्कि हमारा जीवन बीत गया। हमारी इच्छाएं (तृष्णा) बूढ़ी नहीं हुईं, बल्कि हम खुद