अमृत वाणी - संत वाणी - 36

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मक्खी बैठे शहद पर, पंख रहे लपटाए। रज्जब विकल होय धुने सिर, हाथ मले पछताए॥संत रज्जब जी समझाते हैं कि जिस प्रकार एक छोटी सी मक्खी मीठे शहद के लालच में आकर उस पर बैठ तो जाती है, लेकिन उसका लालच इतना बढ़ जाता है कि वह उसमें पूरी तरह डूब जाती है और उसके पंख उसी शहद में लथपथ होकर चिपक जाते हैं। अंत में वह मक्खी चाहकर भी उड़ नहीं पाती और तड़प-तड़प कर, अपना सिर धुनकर और हाथ मलकर केवल पछतावे के साथ अपने प्राण गंवा देती है; ठीक वैसी ही दशा इस संसारी जीव की है जो