“रे बंदे तू काहे के तोत दिवाना।काल अचाका पकरिहै तोहीं, जैहैं प्रान पराना॥”संत धरणीदास जी जीव को सचेत करते हुए कहते हैं कि हे मनुष्य! तू व्यर्थ ही सांसारिक मोह-माया, धन-दौलत और अभिमान में अंधा (दीवाना) होकर क्यों भटक रहा है? याद रख, काल (मृत्यु) अचानक आकर तुझे दबोच लेगा और पल भर में तेरे प्राण इस शरीर को छोड़कर उड़ जाएँगेगहरे अर्थ की विस्तृत व्याख्या संत धरणीदास जी जब कहते हैं “काल अचाका पकरिहै तोहीं”, तो उनका संकेत केवल भौतिक मृत्यु की ओर नहीं है। ‘काल’ का अर्थ समय भी है। समय अचानक बीत जाता है और हमारे हाथ से