अमृत वाणी - संत वाणी - 30

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भारत के कश्मीर प्रांत की चौदहवीं शताब्दी की परम सिद्ध योगिनी और रहस्यवादी संत लल्लेश्वरी जी (जिन्हें कश्मीरी भाषा में लाल द्यद या लल्ला भी कहा जाता है) की एक अत्यंत प्रसिद्ध और अद्भुत अमृत वाणी (वाख) यहाँ दी गई है। उनकी काव्य-शैली को ‘वाख’ कहा जाता है। यह वाणी हमारे जीवन में संतुलन (Balance) और समभाव रखने का असली रास्ता दिखाती है।“खा-खाकर कुछ पाएगा नहीं,न खाकर बनेगा अहंकारी।सम खा तभी होगा समभावी,खुलेगी साँकल बंद द्वार की।।”हिंदी अर्थ : यदि तुम केवल संसार के भोगों और सुख-सुविधाओं में डूबे रहोगे, तो जीवन में कभी भी आत्मज्ञान या सच्ची शांति नहीं