अमृत वाणी - संत वाणी - 22

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हम अक्सर समाज में रहने के लिए दूसरों को खुश करने की कोशिशों में लगे रहते हैं। लोग हमारी थोड़ी सी झूठी तारीफ या चापलूसी कर देते हैं, तो हम फूले नहीं समाते और उनके मानसिक गुलाम बन जाते हैं। इसके विपरीत, यदि कोई हमारी आलोचना करता है, तो हम अंदर से टूट जाते हैं। हमारा रिमोट कंट्रोल दूसरों के हाथों में चला जाता है। इस मानसिक गुलामी और विवेक की कमी को दूर करते हुए समर्थ रामदास स्वामी कहते हैं:“शब्दांचे गौरव बहुत मानिती।अंतरींचे गुज काहीच न जाणती॥” — समर्थ रामदास स्वामी (दासबोध)(अर्थ: जो लोग केवल बाहरी मीठे शब्दों, झूठे