हम अक्सर सोचते हैं कि पवित्रता केवल सुबह नहा-धोकर मंदिर जाने, ग्रंथों को छूने या ऊंचे सामाजिक बंधनों को मानने में है। हम बाहर से तो बहुत साफ-सुथरे और शुद्ध बन जाते हैं, लेकिन हमारे भीतर समाज के कमजोर लोगों के प्रति छुआछूत, भेदभाव और कड़वाहट बनी रहती है। इस खोखली शुद्धता को तोड़ते हुए एकनाथ महाराज ने समझाया कि असली पवित्रता बाहर के छुआछूत में नहीं, बल्कि मन की करुणा में है। उनका एक बहुत ही सुंदर और प्रसिद्ध विचार है:“जिसके हृदय में दया, क्षमा और शांति का वास है, साक्षात परमात्मा वहीं निवास करते हैं। ईश्वर को ढूंढने