हम सब जीवन में ज्ञान पाना चाहते हैं, ईश्वर को खोजना चाहते हैं, और मन की शांति चाहते हैं। इसके लिए हम मोटी-मोटी किताबें पढ़ते हैं, बड़े-बड़े प्रवचन सुनते हैं और खुद को बहुत ज्ञानी समझने लगते हैं। लेकिन इतना सब करने के बाद भी हमारा गुस्सा, हमारा लालच और हमारी बेचैनी वैसी की वैसी ही बनी रहती है। इस खोखले ज्ञान और आंतरिक सच्चाई के अंतर को संत रामकृष्ण परमहंस जी ने एक बहुत ही सुंदर उदाहरण से समझाया है:“किताबों के भीतर ‘पंचांग’ (कैलेण्डर) तो होता है, और उसमें लिखा भी होता है कि इस साल इतनी भारी बारिश