हम इंसानों की एक बहुत अजीब आदत है। हम उस कल के बारे में सोच-सोचकर आज घुटते रहते हैं, जो अभी तक आया ही नहीं है। हमारा आधा जीवन उन मुसीबतों के बारे में चिंता करने में बीत जाता है, जो असल में कभी हमारे जीवन में आती ही नहीं। हम अपने विचारों के पिंजरे में खुद ही कैद हो जाते हैं। इस मानसिक बीमारी को बहुत गहराई से समझते हुए कबीर जी कहते हैं:“चिंता ऐसी डाकिनी, काटि करेजा खाय।वैद बिचारा क्या करे, कहां तक दवा लगाय॥” — संत कबीरदासइस बात को पढ़कर लोग अक्सर एक गहरे विरोधाभास में उलझ